जातीय व्यवस्था क्या है ? जाती का मूल आधार क्या है ?

जातीयता का मूल ।

जातीय व्यवस्था

वर्तमान में जातीय व्यवस्था को मानव विकास के क्रम मे सबसे बड़ी बाधा के रूप मे जोड़कर देखा जा रहा है । कुछ मानसिक विक्षिप्त राजनीतिज्ञ अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए जातीयता को  राजनीति का  आधार बनाकर समाज को खंड खंड करने का षड्यंत्र रच रहे है और इस देश की भोली भालि जनता को कुछ हद तक बरगालने मे सफल भी हो गए है । जिसका भयानक परिणाम जातिगत संघर्ष के रूप मे देखने को मिल रहा है ।

वर्तमान में जातीयता की जड़े इतनी गहरी हो चुकी है की मानव समाज की परिभाषा संकुचित होकर जातिगत समाज के रूप मे परिणित हो गई है । आज प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने जात वाले को नेता, अभिनेता, प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी बनते देखना चाहता है ।  चाहे उसके लिए उसे दूसरी जाती का तिरस्कार अपमान ही क्यो न करना पड़े । जरूरत पड़ने पर वह वर्ग संघर्ष को अंजाम देने से भी पीछे नहीं हटता है । मुझे समझ नहीं आता की यदि जातिवादिता का समाज के विनाश में इतना ही योगदान है तो एतिहासिक काल मे जब भारत गुलाम था, जातीयता चरम पर थी उस समय हमारा देश पूर्ण विकसित, विश्व गुरु, सोने की चिड़िया कैसे हो सकता था ।  कही न कही जातीयता को राजनीतिक हथियार बनाकर राजनीति की जा रही है । जातीयता को समझने के लिए हमें एक बार पुनः इतिहास के पन्नो को पलटना होगा, सच को जानने के लिए वैदिक काल की व्यवस्था का अध्ययन  करना होगा । 

जातियों का इतिहास 

शास्त्रो मे वर्णित वर्ण व्यवस्था का गहन व तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चलता है की वैदिक काल में जातीयता जैसा कोई शब्द ही नहीं था । शास्त्रो मे वर्ण व्यवस्था के तहत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,  शूद्र का वर्णन तो मिलता है लेकिन जातीयता या जात शब्द का वर्णन नहीं मिलता है । वास्तव मे जातीयता कुछ नहीं सनातन काल मे बनाई गई वर्ण व्यवस्था का एक उपभाग थी जो सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी ।

वास्तव मे जाती का सम्बोधन कर्म की उपाधि है जिसका प्रयोग कर किए जाने वाले कृत्य/कार्य का सहज आकलन कर लिया जाता है की अमुक नाम का व्यक्ति किस कार्य विशेष मे दक्ष है । वर्तमान मे जैसे क्षेत्र या विषय विशेष मे दक्ष होने पर विशिष्ट उपाधियों से नवाजा जाता है ये उपाधिया नाम के प्रारंभ मे लगती है जैसे डॉक्टर, वकील, इंजीनियर आदि । मेडिकल क्षेत्र मे दक्षता प्राप्त कर लेने पर डॉक्टर,  न्यायालय क्षेत्र मे वकील, कलाकौशल के क्षेत्र में इंजीनियर, शिक्षण क्षेत्र मे गुरुजी आदि ये सब उपाधियाँ है जो संबन्धित व्यक्ति की कार्य दक्षता को इंगित करती है उपरोक्त शब्दो का व्यक्ति विशेष के नाम के साथ प्रयोग करने पर उसका कार्य व उसके कार्य की विशिष्टता स्पष्ट हो जाती है ।

डॉक्टर का नाम लेने से लोग समझ जाते है की वे उपचार का कार्य करते है, गुरुजी शब्द के उच्चारण में ही पठन पाठन के कार्य की झलक मिलने लगती है।  ठीक यही व्यवस्था उस ऐतीहासिक वैदिक कल में भी थी जब वर्ण व्यवस्था समाज के विकास के लिए बनाई गई थी। इसी वर्ण व्यवस्था के तहत कार्य की दक्षता व विशिष्टता के आधार पर कार्य की उपाधी दी गई जो समय के साथ जातीयता मे बदल गई । उदाहरण के लिए मै यहाँ पर जातियता को भलीभाँति समझने के लिए कुछ नाम जाति  के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

(यहाँ पर मेरा उद्देश्य केवल जाती भाव को समझाना है किसी के हृदय को ठेस पाहुचना या किसी का अपमान करना नही है यदि किसी के नाम के साथ मिलान होता है तो यह एकमात्र संयोग होगा जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नही है ) 

  • मोहनलाल विश्वकर्मा
  • शिवम  चमार
  • बंशी लोहार
  • मुक्ता सोनार
  • तिलका कहार
  • भानु मल्लाह
  • मिल्लू तेली
  • लुक्का कक्षवाह
  • कताहुर बढ़ई
  • मोलई कुम्हार आदि

भारत मे जातियो और उपजातियों की संख्या बताना कठिन है सन 1901 की जनगणना के अनुसार भारत मे 2378 जातीया रहती है जिन्हे यदि अंतर्विवाही समूहो मे विभक्त किया जाय तो लगभग 3000 हो जाती है ।

उदहारण

उपरोक्त उदाहरणो का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि उपरोक्त सभी नामो के साथ जाती को कर्म कि उपाधि के रूप मे प्रयुक्त किया गया है | नाम के अंत में जाती बोधक के रूप में प्रयोग किया गया शब्द वास्तव में व्यक्ति के कार्य की विशिष्टता का परिचायक है | मोहनलाल विश्वकर्मा का नाम लेते ही आम आदमी का दिमाग भी उसके कार्य की विशिष्टता का मापन कर लेता है वह समझ जाता है कि मोहनलाल नाम का व्यक्ति निर्माण का कार्य करता होगा, शिवम चमार चमडे का कार्य करता होगा, बंशी लोहार लोहे के औज़ार बनाने का कार्य करता होगा, मुक्ता सोनार आभूषण बनाने का कार्य करता होगा, तिलका कहार पालकी उठाने का कार्य करता होगा, भानु मल्लाह नाव चलाने का कार्य करता होगा |

उपरोक्त उदाहरणो से स्पष्ट है कि वास्तव में वर्तमान में प्रयोग किए जाने वाला जाती शब्द निखिद्र द्रष्टि से नहीं बल्कि कार्य कि दक्षता कि उपाधि के रूप मे देखा जाना चाहिए | लेकिन यथार्थ के धरातल मे राजनीतिक विदूषक जातियता को आधार बना कर अपनी रोटी सेंक रहे है | अंग्रेज़ो की फूट डालो और शासन करो की नीति को अंजाम देकर समाज को  खंड खंड करने पर तुले हुए है | वास्तव में वैदिक कल में कोई जातीगत भाव नहीं था, जाती का कोई स्थान नहीं था | आप स्वयं विचार कीजिये जब कोई आपके सामने किसी व्यक्ति का नाम जात के साथ लेता है तो आपके दिमाग मे उस व्यक्ति की क्या छवि बनती है । किसी ने आपसे कहा की मुक्ता सुनार के यहाँ काम है, चलना है तो आपका दिमाग तुरंत छवि बना लेता है की मुक्ता सुनार के यहा आभूषण बनवाने के लिए चलना है दिमाग मे कभी नहीं आता की मुक्ता सुनार के यहाँ जूते सिलवाने चलना है । ठीक इसी प्रकार यदि कोई आपसे कहे के शिवम चमार के यहाँ काम है, चलना है दिमाग मे तुरंत एक छवि बन जाती है की शिवम चमार के यहाँ जूते सिलवाने या जूते खरीदने चलना है दिमाग मे शिवम चमार का नाम लेने पर यह कभी नहीं आता की शिवम चमार के यहा आभूषण बनवाने जाना है ।

अब सवाल ये उठता है की जाती तो कार्य उपाधि है तो उपजाति क्या है ?

उपजाति वास्तव में कार्य की विशिष्टता का उपविभाजन है | विशेष दक्षता का प्रमाण व कार्य विशेष का परिणाम है जैसे मेडिकल क्षेत्र मे उपचार का कार्य करने वाले को सभी चिकित्सको को डॉक्टर कहते है लेकिन यदि वही डॉक्टर किसी क्षेत्र विशेष (रोग विशेष की चिकित्सा आदि) में दक्षता हासिल कर लेता है तो वह उस कार्य के लिए स्पेशलिस्ट के रूप में जाना जाता है जैसे पेट रोग विशेषज्ञ, हड्डी रोग विशेषज्ञ, नेत्र रोग विशेषज्ञ आदि आदि | ठीक इसी प्रकार उपजातियता का प्रदूर्भाव हुआ जैसे पठन-पठान, पूजा संस्कार आदि का कार्य करने वाले को पंडित कहा जाता है | यदि वह दो वेदो का ज्ञाता है तो उसे द्विवेदी, तीन वेदो का ज्ञाता है तो त्रिवेदी, चारो वेदो का ज्ञाता है तो चतुर्वेदी, शास्त्रो का ज्ञाता तो शास्त्री |

कुशवाहो में फूलमाला का कार्य करने वाले, फूलो की खेती को प्राथमिकता देने वाले को माली, हल्दी की खेती को प्राथमिकता देने वाले को हरदिहा की उपाधि दी जाती है | कछवाह (कुशवाहा) उस काल में कृषि कार्य करने वाले को समूहिक रूप से किसान, जो जातीयता के आधार पर कुशवाहा माना जाता है इसमें  भी कई उपजातीयाँ और गोत्र है जैसे कुशवाहो में हरदिहा, कनौजिया, कांकुब्ज, माली आदि | कई जगह जातियो व उपजातियो का उदबोधन गुरुओ की वंशावाली के नाम पर भी आधारित है | वर्तमान में भी शुभ कार्य की पूर्णता के लिए गुरुदिक्षा का विशेष महत्तव व संस्कार का अनिवार्य भाग बताया गया है वैदिक काल में यह परंपरा चरम पर थी | जो भी व्यक्ति गुरुदीक्षा लेते थे गुरुदीक्षा देने वाले गुरु गुरुदीक्षा उपरांत पहचान चिन्ह स्वरूप शिष्य को अपने नाम का प्रयोग करने की अनुमति प्रदान करते थे |

उपसंहार

विश्लेषण करने पर एक बात तो स्पष्ट है की जातीयता वैदिक काल में अभिशाप नहीं थी अपितु कार्य के विशिष्टता की उपाधि थी लेकिन बाद में कार्य की विशिष्टता ने अनुवांशिक आधार ले लिया | विशिष्टता, दक्षता विलोपित हो गई और अनुवांशिक होकर अभिशाप बन गयी |

अब विचारणीय प्रश्न यह है की ऐसा क्या हुआ की विशिष्ट दक्षता व उपाधि का प्रतीक वर्तमान की जातीयता समाज के लिए अभिशाप कैसे बन गई ? इन प्रश्नो के जवाब के लिए हमे आधुनिक विज्ञान के तथ्यो का अध्ययन करना होगा |

आधुनिक विज्ञान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में आनुवांशिक गुण होते है जो सात पीढ़ियों में से किसी के भी परिलक्षित हो सकते है अर्थात हम सबके अंदर हमारी सात पीढि के पूर्वजो में से किसी न किसी के गुणधर्म अवश्य मिलते होगे | डीएनए टेस्ट आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसका परिवर्तित रूप है | जिसका प्रमाणन हमारे वैदिक काल में मिलता है इसी आधार पर हमारे पूर्वजो का मानना था की यदि किसी कारण वश पिता कार्य करने के सक्षम नहीं हो पता था तो हम उसके पुत्र से उसी कार्य को करवाने के लिए सहमत हो जाते थे की पिता के गुणो का प्रभाव कुछ न कुछ पुत्र पर अनुवांशिक रूप से अवश्य होगा इस कारण वह अन्य लोगो की  अपेक्षा कार्य को उचित तरीके से कर पाने में सक्षम होगा | इसी आधार पर हमारे पूर्वज कार्य विशेष में दक्ष व्यक्ति के परिवार को भी कार्य दक्षता का आधार मानकर उनसे कार्य करवाने लगे | जिसका परिणाम यह हुआ कार्य पर आधारित जातिगत उपाधि जातियता में परिणित हो गई व कार्य विशिष्टता के आधार पर दी जाने वाली उपाधि जातिगत हो गयी |

जाती के आधार पर किसी व्यक्ति के कार्य का आकलन करना मूर्खता से भरा हुआ है | वर्तमान में किसी भी कार्य पर, किसी भी वर्ग जाती का कोई विशेष अधिकार व विशिष्ट दक्षता का पर्याय नहीं  है । कार्य के प्रति कोई जातिगत बंधन नहीं है सभी स्वतंत्र व समान रूप से कोई भी कार्य कर सकते है | सभी कोई अपनी स्वेच्छा से कार्य का चुनाव कर सकते है व कार्य में दक्षता प्राप्त कर सकते है इसलिए वर्तमान में जातीयता अभिशाप है जिसका खत्म होना नितांत आवश्यक है या फिर एतिहासिक वैदिक काल की तरह कार्य के आधार पर उपाधि देने की आवश्यकता है | केवल जन्म के आधार पर जातीयता का उदबोधन मूर्खता का परिचायक है |

नाम के साथ कर्म की उपाधि को समझने के लिए कुछ नाम उदाहरण के तौर पर लेकर समझते है ।

माना किसी सज्जन का नाम है कल्लू चर्मकार है । यहाँ पर वास्तव मे सज्जन का नाम कल्लू है तथा चर्मकार वर्ण व्यवस्था के अनुसार उसके कर्म की उपाधि है । अब यही सज्जन पढ़ लिखकर वकील बन गए और अपना नाम लिखने लगे एडवोकेट कल्लू चर्मकार । अब यहाँ पर एडवोकेट उनके कर्म की उपाधि है और उनका नाम कल्लू चर्मकार होगा ।

। जय माता पिता । 

टिप्पणियाँ

किसी भी परिवार में जब अपनी बेटी को अपने घर में स्वन्त्रता से रहने खाने पहनने बोलने की छूट व स्नेह देते हैं तो जब हम अपने ही बेटे के लिए किसी अपने सामाजिक परिवार की बेटियों को लेकर भ्रांति क्यो रखते हैं खुद की बेटी 8 बजे तक सो रही हैं तो कुछ नहीं उस की भी कभी थकान य इच्छुक रही तो जो कभी बेटियां थी या बेटे थे सास ससुर बन अपने बेटे बेटियों की दूसरे के सामने निन्दा करते हैं व बच्चों से सम्मान की अपेक्षा क्या उचित है यह भी कुरीति ही है जोकि अभी लगभग सब अपने परिवार या आसपास देख रहे हैं