जन प्रतिनिधि चुने जाते है या चुनवाये जाते हैं?

पंचायत चुनाव मध्यप्रदेश

जी हाँ, शायद ये सुनने में अटपटा लगे पर एक बार खुद से यही सवाल पूछ कर देखिए। जवाब न मिले तो परेसान न होइए क्योंकि ये जवाब मुझे भी नही मिला !

पहले प्रक्रिया को समझते हैं

वैसे तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र वाला देश है जहाँ पर सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं। हर नागरिक अपने विशेष अधिकार मतदान का अधिकार का प्रयोग कर अपने पसंदीदा राजनेता को जिताने का प्रयास करता है। सबसे ज्यादा मत पाने वाला नेता को चुन कर 5 सालों के लिए कुर्सी पर बैठाता है। पाँच साल के बाद फिर से चुनाव होता है और जनता फिर से अपने बीच मे से उसी नेता या किसी और को सत्ता पर बिठाती है।

यह तो हुई आदर्श कल्पना और भारत का संविधान भी यही है पर क्या वास्तव में ऐसा ही होता है? जैसे ही चुनाव आता है सभी नागरिकों को मौका दिया जाता है कि वो अपने आप को उम्मीदवार के रूप में लोगो के समझ प्रस्तूत करें। पर होता ये है कि इन उम्मीदवारों में एक भी उम्मीदवार ऐसा नही होता जो कि वास्तविक रूप से संविधान द्वारा बनाये सभी नियमों पर खरा उतरता हो तथा मन मे सेवा भाव लेकर चुनावी मैदान में उतरता है।

आदर्श उम्मीदवार तो ऊमर के फूल होते हैं

साफ सुथरी छवि वाला उम्मीदवार ढूढ़ना भूसे के ढेर में सुई ढूढ़ने के जैसा है । इस विडंबना का कारण और कोई नही बल्कि हम आम जनता ही है क्योंकि राजनीति समाजसेवा से स्वयंसेवा कब बन गयी पता ही नही चला। जब चुनाव जन सेवा करने के लिए न लड़कर स्वयं की सेवा करने के लिए लड़ा जाएगा तो जाहिर सी बात है चुनाव जीतना मुस्किल ही होगा। अब यहाँ आता है अशली खिलाड़ी जो चुनाव के नतीजों को झकझोर कर रख देता है व चुनाव परिणाम को अनअपेक्षित कर देता है, वह है धन। ईमानदार और नये उम्मीदवार के लिए उतना धन जुटना असम्भव है जितना कि पहले से इस्थापित उम्मीदवार के लिए होता है और वह आर्थिक मजबूती के लाभ लेते हुए ईमानदार और नए चेहरों को दबा देता है।

चुनावी प्रलोभन से बचना है

अगर आप की छवि साफ सुथरी नही है फिर भी चुनाव जीत रहे है इसका मतलब आपने जमकर लालच दिया और लालच आम जनता के मन मे उस कदर घर कर गया है कि एक शीशी देसी मदिरा लेकर लोग अपना 5 साल उस नेता के पास गिरवी रख देते है जो सिर्फ उस पैसे को समेटने में लगा है जिस पैसे को प्रलोभन के तौर पर चुनाव के वक्त आम जनता पर खर्च किया गया था।

चुनाव हमेशा मुद्दों पर होना चाहिए और लोकतंत्र में जनता की भागीदारी अति महत्वपूर्ण है जो कि सिर्फ मतदान करने से पूर्ण नही हो जाती। आप समय- समय पर अपने नेता को याद दिलाते रहिये उसके वादों को और उन मुद्दों जो जिन्हें देखकर आपने उसे अपना मत दिया है।

जरा सी चूक पाँच साल का नुकसान

अगर आप ऐसे व्यक्ति को चुनेंगे जो आप के बीच का हो कोई अपराधिक प्रबृत्ति वाला न हो तथा समय आने और जिस तक आप आसानी से पहुच सके तभी आपके मत का सही उपयोग होगा। वो नेता किस काम का जिसके पास आप समस्या लेकर ही न जा सके? आप डरिये मत डरना उस नेता को चाहिए कि अगर उसने काम नही किया , अपने वादे पूरे नही किये तो जनता उनका शाशन स्वीकार नही करेगी व सत्ता से उखाड़ फेंकेगी। नेता जनता का प्रतिनिधि है जी जनता को प्रस्तुत करता है ना कि स्वयं के लाभ के लिए नौकरी पर बैठ है।

जिस दिन आम आदमी अपने अधिकारों के प्रति वफादार और जागरूक होकर सही व्यक्ति की चुनेगा, क्षणिक लाभ को भूलकर दूरगामी परिणाम के बारे सोचेगा उस दिन सही मायनों में लोकतंत्र एक ताक़त के रूप में उभरेगा।

दारू, कम्बल, चप्पल जूते ये सब आपके लिए कोई मायने नही रखते अगर आप 5 साल के विकास की तुलना इन तुच्छ वस्तुओं से करते है तब आप वाकई अपने साथ भला तो बिल्कुन नही कर रहे। एक अच्छे नेता का चुनाव आपको अच्छी सड़के, खेतों में पानी, सस्ता खाद व बीज, बच्चों के विद्यालय और क्या क्या नही दे सकता फिर आप ही सोचिये आप इस बार अपना नेता चुनेगे या नेता के द्वारा खुद को चुनवाने के जाल में हमेशा की तरह उलझेंगे !

 

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